#Pitrupaksh #पितृपक्ष: पितरो के प्रति श्रद्धा और समर्पण का समय

पितृपक्ष, जिसे आमतौर पर पितृ श्राद्ध भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण और अद्वितीय धार्मिक उत्सव है, जिसे पितरों की आत्माओं को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाता है। यह उत्सव चालीस दिनों तक चलता है और विशेष रूप से पितरों के आत्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति की कामना के साथ मनाया जाता है। इस ब्लॉग में, हम पितृपक्ष (Pitrupaksh) के महत्व, इसके प्रकार, और इसे कैसे मनाया जाता है, इन सब बातों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।


1. पितृपक्ष का महत्व:

पितृपक्ष का महत्व हिन्दू धर्म में गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य पितरों की आत्माओं को श्रद्धांजलि देना और उनकी आत्मा की शांति की प्राप्ति की प्रार्थना करना है। हिन्दू धर्म में माना जाता है कि पितरों की आत्माएं अमर होती हैं और वे अपने परिवार के निर्वाचन को देखती हैं। इसलिए उनकी प्रसन्नता और आत्मा की शांति के लिए उन्हें प्राप्त करने के लिए पितृपक्ष का आयोजन किया जाता है।


2. पितृपक्ष के प्रकार:

पितृपक्ष के तीन प्रकार होते हैं:

सौथिक पितृपक्ष (आदिपक्ष): यह पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के प्रत्येक तिथि पर मनाया जाता है और इसके दौरान पितरों की पूजा की जाती है।

प्रतिपक्ष (अश्विनी मास): इस पितृपक्ष में पितरों की पूजा का मुख्य दिन बृहस्पतिवार होता है, जब लोग श्राद्ध करते हैं और अपने पूर्वजों के लिए दान देते हैं।

गृहयोग (आश्विनी मास): यह पितृपक्ष आश्विनी मास के शुक्ल पक्ष के प्रत्येक तिथि पर मनाया जाता है और इसके दौरान भोजन और दान की परंपरा होती है।


3. पितृपक्ष कैसे मनाया जाता है:

पितृपक्ष को मनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

श्राद्ध करना: इस प्रमुख धार्मिक कार्यक्रम में पितरों की आत्मा के लिए श्रद्ध किया जाता है। इसमें पितरों के लिए अन्न, पानी, और दान की वस्त्रादि चीजें अर्पित की जाती हैं।

दान देना: लोग पितृपक्ष में गरीबों को भोजन, वस्त्र, और अन्य आवश्यक वस्त्रादि कुछ भी दान करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य दान करके पितरों की आत्मा को आनंदित करना है।

पूजा करना: पितृपक्ष में पितरों की पूजा की जाती है, जिसमें विशेष पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है।

प्रार्थना करना: लोग पितृपक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

4. पितृपक्ष के महत्वपूर्ण स्थल:

पितृपक्ष के महत्वपूर्ण स्थलों में लोग जाते  है, जैसे कि गया, उज्जैन, पुष्कर, बद्रीनाथ, और प्रयागराज। इन स्थलों पर पितृपक्ष के अवसर पर बड़े धार्मिक महोत्सव का आयोजन किया जाता है, और लाखों लोग यहाँ आते हैं ताकि वे पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर सकें।


5. पितृपक्ष का महत्व आजकल:

आजकल, लोग अक्सर अपने दिनचर्या के चलते विभिन्न कार्यों में व्यस्त रहते हैं और धार्मिक उत्सवों को छूने का अवसर नहीं पाते हैं। हालांकि, पितृपक्ष जैसे धार्मिक उत्सव हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाने और उनके प्रति कृतज्ञता दिखाने का मौका प्रदान करते हैं। यह एक अवसर है जब हम अपने परिवार के सदस्यों के साथ समय बिता सकते हैं और अपने धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में शामिल कर सकते हैं।

पितृपक्ष एक महत्वपूर्ण पारंपरिक उत्सव है जो हमें हमारे पूर्वजों के साथ कनेक्ट करता है और हमारे जीवन में शांति और सांत्वना का अहसास कराता है। यह एक समर्पण और सेवा का अवसर होता है, जो हमारे समाज के मूल्यों और संस्कृति के महत्व को दर्शाता है।


आखिर तक पढ़ने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।

जय हिन्द ..

Ganesh Chaturthi Puja: Do Ganpati Prana Pratistha at your home itself गणेश पूजा : गणपति प्राणप्रतिष्ठा अपने घर पर ही करे


गणेश पूजा का महत्व:

गणेश पूजा हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण और प्रमुख पूजा है जो भगवान गणेश, विद्या, बुद्धि, और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मानी जाती है। इस पूजा का मुख्य उद्देश्य गणपति के आशीर्वाद को प्राप्त करना है, ताकि जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि हो सके।



आचमन: ॐ केशवाय नम:। ॐ नारायणाय नम:. ॐ माधवाय नम:. इन नामों का जप दो बार करना चाहिए। ॐ गोविंदाय नम:. इस नाम पर पानी छोड़ा जाना चाहिए. इन सारे नामों को हाथ जोड़कर बोलना चाहिए। फिर प्रणाम करें

आसन शुद्धि: यह शुद्धि जमीन को छूकर करनी होती है।

भूतोत्सारण: अक्षत को हाथ में लेकर दक्षिण दिशा में फेंक दें।

षडंगन्यास: शरीर की शुद्धि के लिए गोद को सामने रखकर दोनों हाथों से न्यास करें।

कलश पूजा: कलश में जल से भरा हुआ पुष्प, सुगंधित पुष्प चढ़ाना चाहिए। भारतीय संस्कृति में कलश प्रार्थना का प्रतीक है। शुभ अवसरों पर कलश की पूजा करने की प्रथा है। इसमें चारों वेदों का वास माना जाता है और सभी वेद अपने छह अंगों सहित इस कलश में हैं।

शंखपूजा: शंख को स्नान कराकर गंध और पुष्प डालें। शंखमुद्रा दिखाकर प्रणाम करना चाहिए।

घंटी-पूजा: घंटियां बजानी चाहिए। घंटे में गंध, अक्षत, पुष्प और हल्दी प्रवाहित करनी चाहिए।

दीप पूजा: समई धूप, फूल और हल्दी से भरी होनी चाहिए।

प्रोक्षण:
दुर्वासा को पूजन सामग्री तथा स्वयं पर जल छिड़कना चाहिए।

प्राणप्रतिष्ठा:
दो दुर्वांकुरों को भगवान गणेश का स्पर्श कर प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिए। इस दौरान दाहिने हाथ से एक लोटा पानी छोड़ना चाहिए। फिर दुर्वांकुरा को गणपति के पैर छूने चाहिए.

अभिषेक: गणेश जी पर फूल या दूर्वांकुरा से जल छिड़कें और अभिषेक करें।

प्राणप्रतिष्ठा स्मपुर्ण हुई, इसके बाद गणपति बाप्पा और भगवान शंकर की आरती करके उनको प्रसाद और नैवेद्य का भोग लगाकर सभी उपस्थितोको प्रसाद बाटे।



।।श्री गणेश आरती ।।

सुखकर्ता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नांची|

नुरवी; पुरवी प्रेम, कृपा जयाची |

सर्वांगी सुंदर, उटी शेंदुराची|

कंठी झळके माळ, मुक्ताफळांची॥१॥

जय देव, जय देव जय मंगलमूर्ती|

दर्शनमात्रे मन कामना पुरती ॥धृ॥

रत्नखचित फरा, तुज गौरीकुमरा|

चंदनाची उटी , कुमकुम केशरा|

हिरेजडित मुकुट, शोभतो बरा |

रुणझुणती नूपुरे, चरणी घागरिया|

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ॥२॥

लंबोदर पीतांबर, फणिवरबंधना |

सरळ सोंड, वक्रतुंड त्रिनयना|

दास रामाचा, वाट पाहे सदना|

संकटी पावावे, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना|

जय देव जय देव, जय मंगलमूर्ती|

दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥३॥


।।भगवान शंकर की आरती ।।

लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा ।

वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा ॥

लावण्यसुंदर मस्तकीं बाळा ।

तेथुनियां जल निर्मळ वाहे झुळझूळां ॥ १ ॥
 


जय देव जय देव जय श्रीशंकरा ।

आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा ॥ ध्रु० ॥



कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा ।

अर्धांगीं पार्वती सुमनांच्या माळा ॥

विभुतीचें उधळण शितिकंठ नीळा ।

ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा ॥ जय देव० ॥ २ ॥



देवीं दैत्य सागरमंथन पै केलें ।

त्यामाजीं जें अवचित हळाहळ उठिलें ॥

तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें ।

नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झालें ॥ जय देव० ॥ ३ ॥
 


व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी ।

पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी ॥

शतकोटीचें बीज वाचे उच्चारी ।

रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं ॥ जय देव जय देव० ॥ ४ ॥
 

कर्पूरगौरं मंत्र

कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।

सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि ॥1॥



इसके बाद संत नामदेव रचित एक प्रार्थना है। उसे भी महाराष्ट्र में सारी आरतीया होने के बाद कहा जाता है।


घालीनलोटांगणवंदीनचरण।।

डोळ्यांनीपाहीनरूपतुझें।।

प्रेमेंआलिंगनआनंदेपूजिन।।

भावें ओवाळीन म्हणे नामा।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।।

त्वमेव बंधुश्‍च सखा त्वमेव।।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।।

त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा।।

बुद्धात्मना व प्रकृतिस्वभावअत्‌।।

करोमि यद्‌त्सकलं परस्मै।।

नारायणायेति समर्पयामि।

अच्युतं केशवं रामनारायणं।।

कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्‌।।

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं।।

जानकीनायकं रामचंद्रं भजे।।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।



जय हिंद ...।

Ganesh Utsav In India: The Joyous Celebration of Lord Ganesha गणेश उत्सव: भगवान गणेश का आनंदमय जश्न

परिचय:

भारत, अपनी संविविध और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाने वाला देश है, जहाँ त्योहार परंपरागत उमंग और भक्ति के साथ मनाए जाते हैं। ऐसा ही एक त्योहार जिसे लाखों भारतीयों के दिल में खास स्थान है, वह है गणेश उत्सव। इसे गणेश चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, जो ज्ञान, समृद्धि और नए आरंभों के भगवान गणेश को समर्पित करता है। इस ब्लॉग में, हम गणेश उत्सव के महत्व, परंपराएँ और उसके भव्यता को गहराई से समझेंगे। गणेशोत्सव जिसे भारत में और दुनियाभरमें जहा जहा भारतीय लोग है, वहा बोहोत ही ख़ुशीसे और धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश उत्सव केवल धार्मिक त्योहार नहीं है; यह एक भव्य मनोरंजन का जश्न है, जो समुदायों को एक साथ लाता है। इसकी तैयारी कई हफ्ते पहले ही शुरू होती है, वातावरण उत्साह और प्रत्याशा से भर जाता है। गणेशोत्सव एक ऐसा त्यौहार है, जो १० दिन तक चलता है। गणेशोत्सव की शुरुवात कैसे हुई और ये त्यौहार कैसे मनाया जाता है, यह आगे पढ़ते है।


Ganesh Utsav In India: The Joyous Celebration of Lord Ganesha               

गणेश उत्सव: भगवान गणेश का आनंदमय जश्न

तिथि:

पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्म हुआ था। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह उत्सव भाद्रपद माह की चतुर्थी से चतुर्दशी तक १० दिनों तक चलता है। इसलिए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन हर साल गणेश चतुर्थी मनाई जाती है।

इतिहास:

गणेश उत्सव की शुरुवात छत्रपती श्री शिवाजी महाराज के बाल्यकाल में उनकी मां राजमाता जिजाऊ द्वारा की गई थी। जिसका उद्देश्य उस प्रदेश के लोगोमे संस्कृती और राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाना था।
भगवान गणेश को बाधाओं को दूर करने वाले और ज्ञान और बुद्धि के भगवान के रूप में पूजा जाता है।। भगवान गणेश को ही गणपति भी कहा जाता है, गणपति नाम का अर्थ है "गणों के अधिपति " (गणेश गणों के प्रमुख हैं)। उनका वर्णन अगर करना है. तो उनका सर हाथी का है और पूरा शरीर इंसान जैसा है। हाथी का जो उनका सर है, उसमे एक ही दाँत है। इसलिए उनको एकदन्त (एकदन्त-एक दाँतवाला) भी कहा जाता है। गणेश जी का पेट बड़ा हैं, इसलिए उन्हें लम्बोदर भी कहा जाता है। उन्हें आमतौर पर अपने हाथ में कुछ लड्डू और मोदक पकड़े हुए दिखाया जाता है, जो उनको बोहोत प्रिय है।


 आगमन और स्थापना:

वैसे तो पुरे भारतवर्ष में गणेशोत्सव मनाया जाता है। पर महाराष्ट्र में होनेवाला गणेश उत्सव बोहोत ही बड़े पैमाने पे मनाया जाता है। सभी लोग गणपति बाप्पा के आगमन के लिए रंगबिरंगी फूलो की सजावट करते है। गणेश चतुर्थी के दिन जिसमे लाखो लोग अपने गणपति देवता की आकर्षक मूर्तियों को ढोल, नगारो के धूमधाम में बोहोत ही आनंददमय वातारण में घर पर लेकर आते है। गणपति बाप्पा के स्वागत में उनका विधिवत पूजा के साथ प्राणप्रतिष्ठा करके उनको घरमे स्थापित किया जाता है। गणपति बाप्पा के पसंदीदा मोदक, लड्डू और मिठाईया भी प्रसाद के लिए रखी जाती है। उसके साथ ही बाप्पा के भोग के लिए पुरणपोळी, खीर, बासुंदी के साथ ही अनेक प्रकार के तरह तरह के भारतीय व्यंजन भी बनते है। गणपति उत्सव में लोग एकदूसरे के घर मिठाईया लेकर जाते है। हर घर में ही गणेश उत्सव में १०  दिन अलग पकवान बनते जो बच्चे, बूढ़े सभी को बोहोत पसंद होते है।

समारोह:

महाराष्ट्र के गणेश उत्सव की और एक खास बात है "सार्वजनिक गणेश उत्सव" यह बोहोत ही विशाल होता है। इस प्रकार के सार्वजनिक गणेशोत्सव में युवा- वृद्धोंका योगदान होता है। इस उत्सव में हर गणेश मंडलो में आयोजन युवा करते है और युवाओके उत्साह से गणेश उत्सव जोशपूर्ण और आनंदमय हो  जाता है। महाराष्ट्र के लोग अपने गली, मोहल्ले में भी बाप्पा की मनमोहक मुर्तिया ढोल-ताशे बजाते, नाचते, गाते स्थापित करते है। मुंबई, पुणे और नाशिक जैसे बड़े शहरों में बाप्पा की विशालकाय मुर्तिया स्थापित की जाती है। दक्षिण भारत के कुछ शहरों में बाप्पा की विशाल मुर्तिया स्थापित की जाती है। उस जगह को आकर्षक रंगबिरंगी लाइटिंग और फूलो से सजावट की जाती है। सजावट में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक सन्देश देने वाले दृश्य भी होते है। गणपति बाप्पा के आगमन के लिए हजारो की तादात में लोग आते है। १० दिन के लिए ये उत्सव मनाया जाता है, जो इतना विशाल होता है, जिसमें सभी धर्मो के हजारो लाखो लोग गणपति बाप्पा के दर्शन करने और सजावट, प्रदर्शनी देखने के लिए आते है। मुंबई के लालबाग इलाके में जो गणपति बाप्पा विराजते है, उनको "लालबाग चा राजा कहा जाता है। लालबाग राजा की मूर्ति सबसे विशाल और आकर्षक मूर्ति होती है। गणपति उत्सव के १० दिनों में लाखो गणेश भक्त उनके दर्शन करने के लिए देश के अलग अलग राज्योंसे मुंबई में आते है। फॉरेनर्स विशेष रूप से गणपति उत्सव में जो उत्साह और चैतन्यपूर्ण माहौल है, उसका आनंद लेने के लिए भारत आते है। गणेशजी की दिन में दो बार आरती होती है। जिसके बाद छोटे बच्चो का फेवरिट मोदक, फल प्रसाद में बाटा जाता है। गणपति उत्सव के दिन शाम की आरती होने के बाद संगीत, नृत्य , खेल आदी का आयोजन किया जाता है। साथ ही गरीबो के लिए अन्नदान और उनकी जरुरत का सामान भी दिया जाता है। मुझे गणेश उत्सव में बोहोत अच्छी लगने वाली बात यह है की इस उत्सव में सभी धर्म के लोग आपस में मिल जुलकर ये उत्सव मनाते है। जिससे धर्मो के नागरिको में आपसी भाईचारा भी बढ़ता है और सामाजिक स्वास्थ्य भी अधिक दॄढ होता है।

विसर्जन:

अनंत चतुर्दशी को १० दिन गणेशजी की मनोभाव से पूजा करने के बाद भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी मतलब गणपति बाप्पा के स्थापना करने के बाद १० वे दिन बाप्पा का विसर्जन होता है। अब १० दिनों तक पूजा करने के बाद गणपति बाप्पा को विसर्जित क्यों करते है?? तो उसकी कथा कुछ ऐसी है, वेदव्यास जी ने जो महाभारत गणपति बाप्पा को सुनाई, तब बाप्पा ने महाभारत को १० दिनों में बिना रुकावट के लिख दिया। १० दिन तक बिना रुके महाभारत लिखने के बाद गणेश जी के शरीर का तापमान बढ़ गया, तो व्यासजीने गणेशजी के शरीर का तापमान कम करने के लिए उनको पानी में डुबाया। इसी वजह से १० दिन के बाद बाप्पा को विसर्जन करने की मान्यता है।


अनंत चतुर्दशी के दिन मुंबई में लाखो गणेश भक्त देश भर से गणेश विसर्जन देखने के लिए मुंबई में आते है, इन में विदेशी पर्यटक भी गणपति बाप्पा को विदा करने के लिए इस विशाल जनसमुदाय के साथ शामिल होते है। त्योहार के अंतिम दिनों में सबसे दृश्यमय हिस्सा है, विशाल प्रदर्शनों की व्यापकता जो होती है। भक्तगण सड़कों पर मूर्ति को लेकर बड़े धूमधाम से निकलते हैं, जिसमें संगीत, नृत्य, और "गणपति बाप्पा मोरया!" (भगवान गणेश का आवाहन हो!) के उत्साहित नारे बजते हैं। इन प्रदर्शनों से रंगों, रोशनियों, और संस्कृति के दृश्य का आकर्षक प्रदर्शन होता है। डीजे, ढोल, ताशे, नगारे, आतिशबाजी ओर लेझीम पथक के डांस के साथ बाप्पा के रथ समुन्दर की और प्रस्थान करते है। जहा देखो भीड़ ही भीड़ होती है, जिनपर चारो तरफ से गुलाल की होली ही खेली जाती है। गणपति बाप्पा के ऊपर पुष्पवृष्टि की जाती है। सारा माहौल “गणपति बाप्पा मोरया” की घोषणावोसे गूंजता रहता है। गणेश भक्त बोहोत ही खुशीसे नाचते, गाते अपने प्रिय बाप्पा को विदा करने आते है। पर जैसे ही विसर्जन की घडी आती है, उस समय हर भक्त दुःखी भी होता है और बाप्पा को विदा करते वक्त दुखी होना भी एक प्रकार से गणपति बाप्पा के प्रति जो प्रेम और भक्ति है उसे ही दर्शाता है। क्युकी १० दिन जिनकी पूजा की उन्हीको विदा करना पड़ता है, इससे गणपति बाप्पा हमे एक सिख भी देकर जाते है, की “जो इस धरती पर आते है, उनको एक दिन जाना भी पड़ता है”, तो भूतकाल में न रमते हुए हमेशा वर्तमान में जीना चाहिए और भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए। यही सिख लेकर सभी गणेश भक्त गणपति बाप्पा को “पुढच्या वर्षी लवकर याss” मतलब अगले साल जल्दी आइये आपका इंतजार करेंगे ऐसा कहकर उनकी एक आखरी बार पूजा करके उनको समुन्दर में विसर्जित करते है।



गणपति बाप्पा सभीको खुश रखे, यह प्रार्थना गणपति बाप्पा को करते हुए आज यही रुकता हु!

"गणपति बाप्पा मोरया,मंगलमूर्ति मोरया
" !!!


आखिर तक पढ़ने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।


जय हिंद…!