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Israel Vs Palestine War Reason इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष का प्रमुख कारण

इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष एक दीर्घकालिक और गहरे रूप से निहित संघर्ष है जिसमें ऐतिहासिक, सीमांत, राजनीतिक और धार्मिक कारक होते हैं। इस्राइल और पैलेस्टाइन के बीच की संघर्ष या समस्या का पूरा विवरण प्राप्त करने के लिए, हमें इन दोनों क्षेत्रों के इतिहास, संकट, और विभिन्न पहलुओं को समझने की जरूरत है। Israel Vs Palestine War Reason इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष का प्रमुख कारण इस ब्लॉग में इजरायल और पैलेस्टाइन के बीच की इतिहास और भूमि संघर्ष की जानकारी दी गई है। 
Israel Vs Palestine War Reason इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष का प्रमुख कारण

इतिहास:

इस्राइल और पैलेस्टाइन का संघर्ष लगभग एक सदी से ज्यादा का है। इस्राइल का गठन 1948 में हुआ था, जिससे एक यहूदी राष्ट्र का निर्माण हुआ, जो पैलेस्टाइन के तट पर स्थित था।

इस समय, पैलेस्टाइन में बसे हुए अरब मुस्लिमों ने इस गठन को मान्य नहीं किया और इसे एक अत्याचार माना। इससे एक जम्मू और कश्मीर जैसी स्थिति उत्पन्न हुई, जिसमें भूमि के स्वामित्व पर विवाद था।

इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष एक दीर्घकालिक और गहरे रूप से निहित संघर्ष है जिसमें ऐतिहासिक, सीमांत, राजनीतिक और धार्मिक कारक होते हैं। नीचे इजरायल और पैलेस्टाइन के बीच की इतिहास और भूमि संघर्ष की संक्षेप जानकारी दी गई है:

Israel Vs Palestine War Reason इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष का प्रमुख कारण

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

  • 20वीं सदी से पहले: ऐतिहासिक रूप से पैलेस्टाइन क्षेत्र का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसमें कैनानिट्स, इस्राएलिट्स, रोमन, बाइजंटाइन्स और अरब शामिल हैं।
  • 19वीं सदी के आखिर में: 19वीं सदी के आखिर में, एक आंदोलन जियोनिज़्म उत्पन्न हुआ, जिसने पैलेस्टाइन में एक यहूदी गृहस्थल की स्थापना के पक्ष में था, जो तब ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। यहूदी प्रवासी इस क्षेत्र में बसने लगे।
  • प्रथम विश्व युद्ध: प्रथम विश्व युद्ध के बाद, ओटोमन साम्राज्य का पतन हो गया और संघ राष्ट्रों ने पैलेस्टाइन को शासन करने का मंडेट ब्रिटेन को प्रदान किया। इस काल के दौरान, यहूदी प्रवासन बढ़ गया, जिससे यहूदी और अरब समुदायों के बीच टकराव बढ़ा।
  • 1947 UN पार्टीशन प्लान: संयुक्त राष्ट्र ने 1947 में पैलेस्टाइन को अलग-अलग यहूदी और अरब राज्यों में विभाजित करने की योजना प्रस्तुत की, जिसमें जेरूसलम को अंतरराष्ट्रीय नगर बताया गया। इस योजना को यहूदी नेताओं ने स्वीकार किया, लेकिन अरब नेताओं ने इसे खारिज किया।

इजरायल का गठन:

  • 1948 की युद्ध: संयुक्त राष्ट्र की पार्टीशन प्लान की मंजूरी के पश्चात्, इजरायल ने 1948 में स्वतंत्रता का ऐलान किया। इससे इजरायल और इसकी स्थापना के खिलाफ होने वाले कई अरब देशों के साथ एक युद्ध हुआ, जिनका उद्घाटन हुआ था। इजरायल विजयी निकला और अपने क्षेत्र का विस्तार किया।
  • पैलेस्टीनी शरणार्थी: 1948 की युद्ध ने बहुत सारे पैलेस्टीनी अरब शरणार्थियों का निकाल दिया, जिन्होंने अपने घरों से भाग गए या उन्हें बेदखल किया गया। यह मुद्दा संघर्ष के मध्य का महत्वपूर्ण बिंदु बना है।

कब्जा और सीमांता विवाद:

  • 1967 की छह दिन की युद्ध: 1967 में, इजरायल ने इजरायल, जॉर्डन, और सीरिया के साथ एक युद्ध लड़ा, जिसे छह दिन की युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध के परिणामस्वरूप, इजरायल ने पश्चिमी तट, गाजा सटाक, पूर्व यरूशलम, और गोलान हाइट्स का कब्जा किया।
  • इजरायली बस्तियाँ: इजरायल ने पश्चिमी तट और पूर्व यरूशलम में बस्तियाँ बनाई हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार गैरकानूनी मानी जाती हैं और शांति संवादों का महत्वपूर्ण बाधक हैं।
  • गाजा पट्टी : हालांकि इजरायल ने 2005 में गाजा पट्टी से अपने बस्तियों और सैन्य वापस लिया, लेकिन यह अब भी गाजा की सीमाओं, वायुमंडल, और तट रेखा पर नियंत्रण रखता है, जिससे मानवाधिकार संकट उत्पन्न हो रहा है।

मुख्य पहलु:

  • भूमि मुद्दा: यह विवाद के मूल कारण में से एक है। इस्राइल के गठन के बाद, यहूदी और पैलेस्टीनियन अरब लोगों के बीच भूमि के स्वामित्व पर घातक विवाद हुआ।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक विवाद: इस्राइल और पैलेस्टाइन के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक भिन्नताएँ हैं। इस्राइल एक यहूदी राष्ट्र है, जबकि पैलेस्टाइन में अधिकांश अरब मुस्लिम हैं। इसके कारण, धर्म, भाषा, और संस्कृति के अंतर से और तनाव बढ़ते हैं।
  • सियासी मुद्दे: इस्राइल-पैलेस्टाइन संघर्ष को राजनीतिक तत्व भी बढ़ावा देते हैं। अन्य देशों की समर्थन और विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप इसे और ज्यादा जटिल बना देते हैं।
  • आतंकवाद: इस संघर्ष के बीच आतंकवादी संगठनों का बढ़ता हुआ प्रभाव है, जो सुरक्षा मुद्दों को और ज्यादा जटिल बनाता है।
  • अपातकालीन स्थितियाँ: इस्राइल और पैलेस्टाइन के बीच कई बार युद्ध और संघर्ष हुए हैं, जिनमें हजारों लोगों की मौके पर मौका मौत हुई है। इन युद्धों में कई अनुग्रहणी मुद्दे उत्पन्न हुए हैं और उनमें से कुछ हल नहीं हुए हैं।


शांति प्रयास:

  • ओस्लो समझौते: 1990 के दशक में ओस्लो समझौते ने पश्चिमी तट और गाजा सटाक के कुछ हिस्सों में पैलेस्टीनी आत्म-प्रशासन के लिए एक ढांचा स्थापित करने का उद्देश्य रखा था। हालांकि एक अंतिम समाधान कभी नहीं प्राप्त हुआ।
  • दो-राष्ट्रीय समाधान: अंतरराष्ट्रीय सहमति का है कि एक दो-राष्ट्रीय समाधान प्राप्त करना चाहिए, जिसमें इजरायल और पैलेस्टाइन एक साथ शांति में रहें। हांलांकि परिसम्मलन बार-बार टूट चुके हैं।

इजरायल-पैलेस्टाइन संघर्ष दुनिया में सबसे जटिल और दीर्घकालिक संघर्षों में से एक है, जिसे गहरी दुखों, प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय पहचानों और हिंसा के इतिहास से चिह्नित किया गया है। स्थायी समाधान के लिए प्रयास जारी हैं, लेकिन सम्पूर्ण और स्थायी शांति समझौते को प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।

युद्ध से कभी शांति प्रस्थापित नहीं  होती। 

जल्द ही इन दोनों देशो की लड़ाई खत्म हो और दोनों देशो के नागरिक शांतिसे, भयरहित वातावरण में रहने लगे यही प्रार्थना करते हुए आज यही रुकता हु।  


जय हिन्द...।।  

Ganesh Utsav In India: The Joyous Celebration of Lord Ganesha गणेश उत्सव: भगवान गणेश का आनंदमय जश्न

परिचय:

भारत, अपनी संविविध और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाने वाला देश है, जहाँ त्योहार परंपरागत उमंग और भक्ति के साथ मनाए जाते हैं। ऐसा ही एक त्योहार जिसे लाखों भारतीयों के दिल में खास स्थान है, वह है गणेश उत्सव। इसे गणेश चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, जो ज्ञान, समृद्धि और नए आरंभों के भगवान गणेश को समर्पित करता है। इस ब्लॉग में, हम गणेश उत्सव के महत्व, परंपराएँ और उसके भव्यता को गहराई से समझेंगे। गणेशोत्सव जिसे भारत में और दुनियाभरमें जहा जहा भारतीय लोग है, वहा बोहोत ही ख़ुशीसे और धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश उत्सव केवल धार्मिक त्योहार नहीं है; यह एक भव्य मनोरंजन का जश्न है, जो समुदायों को एक साथ लाता है। इसकी तैयारी कई हफ्ते पहले ही शुरू होती है, वातावरण उत्साह और प्रत्याशा से भर जाता है। गणेशोत्सव एक ऐसा त्यौहार है, जो १० दिन तक चलता है। गणेशोत्सव की शुरुवात कैसे हुई और ये त्यौहार कैसे मनाया जाता है, यह आगे पढ़ते है।


Ganesh Utsav In India: The Joyous Celebration of Lord Ganesha               

गणेश उत्सव: भगवान गणेश का आनंदमय जश्न

तिथि:

पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश चतुर्थी के दिन माता पार्वती के पुत्र गणेश जी का जन्म हुआ था। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह उत्सव भाद्रपद माह की चतुर्थी से चतुर्दशी तक १० दिनों तक चलता है। इसलिए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन हर साल गणेश चतुर्थी मनाई जाती है।

इतिहास:

गणेश उत्सव की शुरुवात छत्रपती श्री शिवाजी महाराज के बाल्यकाल में उनकी मां राजमाता जिजाऊ द्वारा की गई थी। जिसका उद्देश्य उस प्रदेश के लोगोमे संस्कृती और राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाना था।
भगवान गणेश को बाधाओं को दूर करने वाले और ज्ञान और बुद्धि के भगवान के रूप में पूजा जाता है।। भगवान गणेश को ही गणपति भी कहा जाता है, गणपति नाम का अर्थ है "गणों के अधिपति " (गणेश गणों के प्रमुख हैं)। उनका वर्णन अगर करना है. तो उनका सर हाथी का है और पूरा शरीर इंसान जैसा है। हाथी का जो उनका सर है, उसमे एक ही दाँत है। इसलिए उनको एकदन्त (एकदन्त-एक दाँतवाला) भी कहा जाता है। गणेश जी का पेट बड़ा हैं, इसलिए उन्हें लम्बोदर भी कहा जाता है। उन्हें आमतौर पर अपने हाथ में कुछ लड्डू और मोदक पकड़े हुए दिखाया जाता है, जो उनको बोहोत प्रिय है।


 आगमन और स्थापना:

वैसे तो पुरे भारतवर्ष में गणेशोत्सव मनाया जाता है। पर महाराष्ट्र में होनेवाला गणेश उत्सव बोहोत ही बड़े पैमाने पे मनाया जाता है। सभी लोग गणपति बाप्पा के आगमन के लिए रंगबिरंगी फूलो की सजावट करते है। गणेश चतुर्थी के दिन जिसमे लाखो लोग अपने गणपति देवता की आकर्षक मूर्तियों को ढोल, नगारो के धूमधाम में बोहोत ही आनंददमय वातारण में घर पर लेकर आते है। गणपति बाप्पा के स्वागत में उनका विधिवत पूजा के साथ प्राणप्रतिष्ठा करके उनको घरमे स्थापित किया जाता है। गणपति बाप्पा के पसंदीदा मोदक, लड्डू और मिठाईया भी प्रसाद के लिए रखी जाती है। उसके साथ ही बाप्पा के भोग के लिए पुरणपोळी, खीर, बासुंदी के साथ ही अनेक प्रकार के तरह तरह के भारतीय व्यंजन भी बनते है। गणपति उत्सव में लोग एकदूसरे के घर मिठाईया लेकर जाते है। हर घर में ही गणेश उत्सव में १०  दिन अलग पकवान बनते जो बच्चे, बूढ़े सभी को बोहोत पसंद होते है।

समारोह:

महाराष्ट्र के गणेश उत्सव की और एक खास बात है "सार्वजनिक गणेश उत्सव" यह बोहोत ही विशाल होता है। इस प्रकार के सार्वजनिक गणेशोत्सव में युवा- वृद्धोंका योगदान होता है। इस उत्सव में हर गणेश मंडलो में आयोजन युवा करते है और युवाओके उत्साह से गणेश उत्सव जोशपूर्ण और आनंदमय हो  जाता है। महाराष्ट्र के लोग अपने गली, मोहल्ले में भी बाप्पा की मनमोहक मुर्तिया ढोल-ताशे बजाते, नाचते, गाते स्थापित करते है। मुंबई, पुणे और नाशिक जैसे बड़े शहरों में बाप्पा की विशालकाय मुर्तिया स्थापित की जाती है। दक्षिण भारत के कुछ शहरों में बाप्पा की विशाल मुर्तिया स्थापित की जाती है। उस जगह को आकर्षक रंगबिरंगी लाइटिंग और फूलो से सजावट की जाती है। सजावट में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक सन्देश देने वाले दृश्य भी होते है। गणपति बाप्पा के आगमन के लिए हजारो की तादात में लोग आते है। १० दिन के लिए ये उत्सव मनाया जाता है, जो इतना विशाल होता है, जिसमें सभी धर्मो के हजारो लाखो लोग गणपति बाप्पा के दर्शन करने और सजावट, प्रदर्शनी देखने के लिए आते है। मुंबई के लालबाग इलाके में जो गणपति बाप्पा विराजते है, उनको "लालबाग चा राजा कहा जाता है। लालबाग राजा की मूर्ति सबसे विशाल और आकर्षक मूर्ति होती है। गणपति उत्सव के १० दिनों में लाखो गणेश भक्त उनके दर्शन करने के लिए देश के अलग अलग राज्योंसे मुंबई में आते है। फॉरेनर्स विशेष रूप से गणपति उत्सव में जो उत्साह और चैतन्यपूर्ण माहौल है, उसका आनंद लेने के लिए भारत आते है। गणेशजी की दिन में दो बार आरती होती है। जिसके बाद छोटे बच्चो का फेवरिट मोदक, फल प्रसाद में बाटा जाता है। गणपति उत्सव के दिन शाम की आरती होने के बाद संगीत, नृत्य , खेल आदी का आयोजन किया जाता है। साथ ही गरीबो के लिए अन्नदान और उनकी जरुरत का सामान भी दिया जाता है। मुझे गणेश उत्सव में बोहोत अच्छी लगने वाली बात यह है की इस उत्सव में सभी धर्म के लोग आपस में मिल जुलकर ये उत्सव मनाते है। जिससे धर्मो के नागरिको में आपसी भाईचारा भी बढ़ता है और सामाजिक स्वास्थ्य भी अधिक दॄढ होता है।

विसर्जन:

अनंत चतुर्दशी को १० दिन गणेशजी की मनोभाव से पूजा करने के बाद भाद्रपद माह के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी मतलब गणपति बाप्पा के स्थापना करने के बाद १० वे दिन बाप्पा का विसर्जन होता है। अब १० दिनों तक पूजा करने के बाद गणपति बाप्पा को विसर्जित क्यों करते है?? तो उसकी कथा कुछ ऐसी है, वेदव्यास जी ने जो महाभारत गणपति बाप्पा को सुनाई, तब बाप्पा ने महाभारत को १० दिनों में बिना रुकावट के लिख दिया। १० दिन तक बिना रुके महाभारत लिखने के बाद गणेश जी के शरीर का तापमान बढ़ गया, तो व्यासजीने गणेशजी के शरीर का तापमान कम करने के लिए उनको पानी में डुबाया। इसी वजह से १० दिन के बाद बाप्पा को विसर्जन करने की मान्यता है।


अनंत चतुर्दशी के दिन मुंबई में लाखो गणेश भक्त देश भर से गणेश विसर्जन देखने के लिए मुंबई में आते है, इन में विदेशी पर्यटक भी गणपति बाप्पा को विदा करने के लिए इस विशाल जनसमुदाय के साथ शामिल होते है। त्योहार के अंतिम दिनों में सबसे दृश्यमय हिस्सा है, विशाल प्रदर्शनों की व्यापकता जो होती है। भक्तगण सड़कों पर मूर्ति को लेकर बड़े धूमधाम से निकलते हैं, जिसमें संगीत, नृत्य, और "गणपति बाप्पा मोरया!" (भगवान गणेश का आवाहन हो!) के उत्साहित नारे बजते हैं। इन प्रदर्शनों से रंगों, रोशनियों, और संस्कृति के दृश्य का आकर्षक प्रदर्शन होता है। डीजे, ढोल, ताशे, नगारे, आतिशबाजी ओर लेझीम पथक के डांस के साथ बाप्पा के रथ समुन्दर की और प्रस्थान करते है। जहा देखो भीड़ ही भीड़ होती है, जिनपर चारो तरफ से गुलाल की होली ही खेली जाती है। गणपति बाप्पा के ऊपर पुष्पवृष्टि की जाती है। सारा माहौल “गणपति बाप्पा मोरया” की घोषणावोसे गूंजता रहता है। गणेश भक्त बोहोत ही खुशीसे नाचते, गाते अपने प्रिय बाप्पा को विदा करने आते है। पर जैसे ही विसर्जन की घडी आती है, उस समय हर भक्त दुःखी भी होता है और बाप्पा को विदा करते वक्त दुखी होना भी एक प्रकार से गणपति बाप्पा के प्रति जो प्रेम और भक्ति है उसे ही दर्शाता है। क्युकी १० दिन जिनकी पूजा की उन्हीको विदा करना पड़ता है, इससे गणपति बाप्पा हमे एक सिख भी देकर जाते है, की “जो इस धरती पर आते है, उनको एक दिन जाना भी पड़ता है”, तो भूतकाल में न रमते हुए हमेशा वर्तमान में जीना चाहिए और भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए। यही सिख लेकर सभी गणेश भक्त गणपति बाप्पा को “पुढच्या वर्षी लवकर याss” मतलब अगले साल जल्दी आइये आपका इंतजार करेंगे ऐसा कहकर उनकी एक आखरी बार पूजा करके उनको समुन्दर में विसर्जित करते है।



गणपति बाप्पा सभीको खुश रखे, यह प्रार्थना गणपति बाप्पा को करते हुए आज यही रुकता हु!

"गणपति बाप्पा मोरया,मंगलमूर्ति मोरया
" !!!


आखिर तक पढ़ने के लिए आपका दिल से शुक्रिया।


जय हिंद…!