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Ganesh Chaturthi Puja: Do Ganpati Prana Pratistha at your home itself गणेश पूजा : गणपति प्राणप्रतिष्ठा अपने घर पर ही करे


गणेश पूजा का महत्व:

गणेश पूजा हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण और प्रमुख पूजा है जो भगवान गणेश, विद्या, बुद्धि, और समृद्धि के प्रतीक के रूप में मानी जाती है। इस पूजा का मुख्य उद्देश्य गणपति के आशीर्वाद को प्राप्त करना है, ताकि जीवन में सुख, शांति, और समृद्धि हो सके।



आचमन: ॐ केशवाय नम:। ॐ नारायणाय नम:. ॐ माधवाय नम:. इन नामों का जप दो बार करना चाहिए। ॐ गोविंदाय नम:. इस नाम पर पानी छोड़ा जाना चाहिए. इन सारे नामों को हाथ जोड़कर बोलना चाहिए। फिर प्रणाम करें

आसन शुद्धि: यह शुद्धि जमीन को छूकर करनी होती है।

भूतोत्सारण: अक्षत को हाथ में लेकर दक्षिण दिशा में फेंक दें।

षडंगन्यास: शरीर की शुद्धि के लिए गोद को सामने रखकर दोनों हाथों से न्यास करें।

कलश पूजा: कलश में जल से भरा हुआ पुष्प, सुगंधित पुष्प चढ़ाना चाहिए। भारतीय संस्कृति में कलश प्रार्थना का प्रतीक है। शुभ अवसरों पर कलश की पूजा करने की प्रथा है। इसमें चारों वेदों का वास माना जाता है और सभी वेद अपने छह अंगों सहित इस कलश में हैं।

शंखपूजा: शंख को स्नान कराकर गंध और पुष्प डालें। शंखमुद्रा दिखाकर प्रणाम करना चाहिए।

घंटी-पूजा: घंटियां बजानी चाहिए। घंटे में गंध, अक्षत, पुष्प और हल्दी प्रवाहित करनी चाहिए।

दीप पूजा: समई धूप, फूल और हल्दी से भरी होनी चाहिए।

प्रोक्षण:
दुर्वासा को पूजन सामग्री तथा स्वयं पर जल छिड़कना चाहिए।

प्राणप्रतिष्ठा:
दो दुर्वांकुरों को भगवान गणेश का स्पर्श कर प्राणप्रतिष्ठा करनी चाहिए। इस दौरान दाहिने हाथ से एक लोटा पानी छोड़ना चाहिए। फिर दुर्वांकुरा को गणपति के पैर छूने चाहिए.

अभिषेक: गणेश जी पर फूल या दूर्वांकुरा से जल छिड़कें और अभिषेक करें।

प्राणप्रतिष्ठा स्मपुर्ण हुई, इसके बाद गणपति बाप्पा और भगवान शंकर की आरती करके उनको प्रसाद और नैवेद्य का भोग लगाकर सभी उपस्थितोको प्रसाद बाटे।



।।श्री गणेश आरती ।।

सुखकर्ता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नांची|

नुरवी; पुरवी प्रेम, कृपा जयाची |

सर्वांगी सुंदर, उटी शेंदुराची|

कंठी झळके माळ, मुक्ताफळांची॥१॥

जय देव, जय देव जय मंगलमूर्ती|

दर्शनमात्रे मन कामना पुरती ॥धृ॥

रत्नखचित फरा, तुज गौरीकुमरा|

चंदनाची उटी , कुमकुम केशरा|

हिरेजडित मुकुट, शोभतो बरा |

रुणझुणती नूपुरे, चरणी घागरिया|

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ॥२॥

लंबोदर पीतांबर, फणिवरबंधना |

सरळ सोंड, वक्रतुंड त्रिनयना|

दास रामाचा, वाट पाहे सदना|

संकटी पावावे, निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना|

जय देव जय देव, जय मंगलमूर्ती|

दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥३॥


।।भगवान शंकर की आरती ।।

लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा ।

वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा ॥

लावण्यसुंदर मस्तकीं बाळा ।

तेथुनियां जल निर्मळ वाहे झुळझूळां ॥ १ ॥
 


जय देव जय देव जय श्रीशंकरा ।

आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा ॥ ध्रु० ॥



कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा ।

अर्धांगीं पार्वती सुमनांच्या माळा ॥

विभुतीचें उधळण शितिकंठ नीळा ।

ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा ॥ जय देव० ॥ २ ॥



देवीं दैत्य सागरमंथन पै केलें ।

त्यामाजीं जें अवचित हळाहळ उठिलें ॥

तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें ।

नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झालें ॥ जय देव० ॥ ३ ॥
 


व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी ।

पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी ॥

शतकोटीचें बीज वाचे उच्चारी ।

रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं ॥ जय देव जय देव० ॥ ४ ॥
 

कर्पूरगौरं मंत्र

कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् ।

सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि ॥1॥



इसके बाद संत नामदेव रचित एक प्रार्थना है। उसे भी महाराष्ट्र में सारी आरतीया होने के बाद कहा जाता है।


घालीनलोटांगणवंदीनचरण।।

डोळ्यांनीपाहीनरूपतुझें।।

प्रेमेंआलिंगनआनंदेपूजिन।।

भावें ओवाळीन म्हणे नामा।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।।

त्वमेव बंधुश्‍च सखा त्वमेव।।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।।

त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।

कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा।।

बुद्धात्मना व प्रकृतिस्वभावअत्‌।।

करोमि यद्‌त्सकलं परस्मै।।

नारायणायेति समर्पयामि।

अच्युतं केशवं रामनारायणं।।

कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्‌।।

श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं।।

जानकीनायकं रामचंद्रं भजे।।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।



जय हिंद ...।